गुरुवार, 17 मई 2012

विजयी हुए वही नर जग में, बांध कफ़न सिर रहे लड़े
राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह- क़ुरबानी के पाठ पढ़े
रहे दीवाने आज़ादी के वलिवेदी पर जाय चढ़े
हाथ उन्ही के रत्न है आता सागर में जो कूद पड़े.

मत पूछ मेरे महबूब की सादगी का अंदाज़ ऐ दोस्त,  नज़रें भी मुझ पर थी और पर्दा भी मुझसे था......
मैं गुरेज क्या करता उसके साथ चलने से, जख्म तो नहीं भरता रास्ते बदलने से. डूबता हुआ सूरज मुझे क्या उजाला  देगा, मैं चमक उठुं शायद चाँद के निकलने से...........
किसी के सामने इज़हार-ऐ-दर्द-ऐ-जाँ  ना करूँ, इधर-उधर की बात करूँ हाल-ऐ-दिल बयां ना करूँ,  लगा कर आग  बदन में वो मुझसे चाहता है - के साँस लूं औ फजां को धुआं-धुआं ना करूँ........